Success Story : 90 रुपये सैलरी वाले इस शख्स ने बना दी 4000 करोड़ की कंपनी

Success Story : मात्र कुछ हजार रुपयों से बिजनेस की नींव रखने वाले इस व्यक्ति ने अपनी मेहनत के बूते अपना नाम आसमां में छाप दिया है.आज हम आपको बताने जा रहे है चंदूभाई  के बारे में जिनका पहले ब‍िजनेस में ही भारी नुकसान होने के बावजूद उनका संकल्‍प नहीं टूटा। रोजगार की तलाश में वो एस्ट्रोन सिनेमा कैंटीन चले गए। यहां चंदूभाई ने 90 रुपये के वेतन पर कैंटीन में नौकरी शुरू कर दी। आइए जानते है इसके बारे में विस्तार से।

 

NEWS HINDI TV, DELHI: ज्यादातर लोगों के जीवन में ऐसा क्षण आता है जब आप खुद की क्षमताओं पर व‍िश्‍वास नहीं कर पाते और आपको हर तरफ अंधेरा नजर आता है। लेक‍िन यद‍ि आप खुद पर भरोसा रखें तो हर मुसीबत से पार पा सकते हैं।आज हम ब‍िजनेस (business) के बाजीगर सीरीज में 10वीं पास गुजराती कारोबारी चंदूभाई विरानी (Chandubhai Virani) के बारे में बात करेंगे। एक समय 90 रुपये महीने पर कैंटीन में काम करने वाले चंदूभाई ने आज 4000 करोड़ रुपये की कंपनी खड़ी कर दी है। उनका पोटेटो वेफर्स ब्रांड (Potato Wafers Brand) आज गुजरात, राजस्‍थान, महाराष्‍ट्र और मध्‍य प्रदेश में नामी ब्रांड बना हुआ है।


 

 

 

चंदूभाई विरानी का शुरुआती जीवन


चंदूभाई विरानी (Chandubhai Virani) का जन्म गुजरात के एक किसान परिवार में हुआ था। 1974 में विरानी बंधुओं को नौकरी की तलाश में जामनगर गांव छोड़कर राजकोट जाना पड़ा। पैतृक जमीन बेचने के बाद उनके पिता ने उन्‍हें नया जीवन शुरू करने के लिए 20,000 रुपये की पेशकश की। इसके बाद राजकोट में दोनों भाइयों ने राजकोट में फॉर्म सप्‍लाई का छोटा कारोबार शुरू क‍िया, यह बिजनेस उनका पूरी तरह से व‍िफल रहा।

बालाजी वेफर्स की शुरुआत


पहले ब‍िजनेस में ही भारी नुकसान होने के बावजूद उनका संकल्‍प नहीं टूटा। चंदूभाई और उनके भाई रोजगार की तलाश में लगे रहे। रोजगार की तलाश में वह एस्ट्रोन सिनेमा कैंटीन चले गए। यहां चंदूभाई ने 90 रुपये के वेतन पर कैंटीन में नौकरी शुरू कर दी। कैंटीन कर्मचारी के तौर पर काम करने के साथ चंदूभाई ने और भी छोटे-छोटे कई काम जारी रखे।


 


 

गुजारा करने तक में द‍िक्‍कत


यहां काम करने के दौरान चंदूभाई और उनके परिवार को गुजारा करने में भी द‍िक्‍कत आई। एक बार वह इतने ज्‍यादा दवाब में थे क‍ि उन्‍हें किराये का मकान भी खाली करना पड़ा। इसका कारण यह था क‍ि उनके पास क‍िराये का भुगतान करने के ल‍िए पैसा नहीं था। कैंटीन में काम करने के दौरान चंदूभाई ने जीवन के ल‍िए नया मौका तलाशा। इसके बाद उन्‍होंने अपने भाइयों के साथ म‍िलकर कैंटीन में 1,000 रुपये महीने का कॉन्‍ट्रैक्‍ट क‍िया। इसके बाद चंदूभाई ने आंगन में छोटा सा शेड बनाया और एक कमरे के घर में चिप्स बनाना शुरू क‍िया।


अपने वेफर्स की मार्केट‍िंग के ल‍िए चंदूभाई और उनके भाई 'बालाजी' नाम लेकर आए। उनके इस ब्रांड को थिएटर के अंदर और बाहर दोनों जगह काफी अच्‍छा र‍िस्‍पांस म‍िला। शुरुआती द‍िन उनके ल‍िए काफी मुश्‍क‍िल भरे रहे। उन्‍हें साइकिल पर वेफर्स के बैग लेकर एक दुकान से दूसरी दुकान तक जाना पड़ता था। कुछ समय तक यही स‍िलस‍िला चलता रहा।
 


धीरे-धीरे बालाजी को अपनी क्‍वाल‍िटी और टेस्‍ट के ल‍िए लोगों की तारीफ म‍िलने लगी। बालाजी 1995 में एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदल गई। बाद में इसने नमकीन और अन्य स्‍नैक्‍स का भी प्रोडक्‍शन शुरू क‍िया। आज बालाजी गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में सबसे बड़ा वेफर ब्रांड है। मीड‍िया र‍िपोटर्स के अनुसार वित्त वर्ष 2011 तक चंदूभाई विरानी की अगुवाई वाली बालाजी वेफर्स का राजस्व 4,000 करोड़ रुपये था।